वीर्यनाश से होने वाले आध्यात्मिक असर

5. आध्यात्मिक असर

इस जन्म के हमारे कृत्यों से हमारी आदतें बनती हैं। आदतों से वृत्तियाँ बनती हैं। और उन्हीं वृत्तियों से हम अपना सूक्ष्म शरीर बनाते है।

जिससे हमे हमारा अगला जन्म किस योनि में मिलेगा यह निश्चित होता है।

अतः जब आप अपने जीवन में संभोग वृत्ति को बढ़ाते हो, तो भगवान आप पर दया करके एक ऐसा शरीर देते हैं जिसमें आप निश्चिंत होकर प्रतिदिन अधिक से अधिक मादाओं के साथ संभोग कर पाओ।

जैसे की कबूतर या सूअर आदि का। क्योंकि इन योनियों में आप प्रतिदिन सरलता से 30-40 बार अलग अलग मादाओं के साथ संभोग कर पाओगे।

तो यदि आपका जन्मांतर ध्येय ऐसी किसी पशु, पक्षी या कीट योनि में जाना ही है तो आपको ब्रह्मचर्य की चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

आपको भरपूर अभिनंदन हमारी ओर से, आप सही मार्ग पर चल रहे हो।

परंतु यदि आपको आध्यात्मिक उन्नति चाहिए है, आप मानवों या देवों आदि में उच्च योनि में जाना चाहते हो।

या फिर आपको इस जन्म-मृत्यु व जरा – व्याधि के चक्र से ही मुक्त होना है तो फिर आपको ब्रह्मचर्य का तप स्वीकार करना ही होगा।

क्योंकि,

आपके वीर्य की दिशा ही आपके आध्यात्मिक पथ की गति निश्चित करती है। जिसके अनुसार व्यक्ति के मुख्यतः तीन प्रकार बताए गए है,

1. ऊर्ध्वरता :

जो व्यक्ति अपने वीर्य की रक्षा करता है, उसका वीर्य रीढ़ की नसों से होकर ऊर्ध्व दिशा में मस्तिष्क की ओर प्रवाहित होता है। वह वीर्य फिर अमृतावस्था को प्राप्त होकर व्यक्ति के ब्रह्मरन्ध्र और मस्तिष्क की नाड़ियों को पोषित करता है। ऐसे व्यक्ति को ऊर्ध्वरता कहते है और इनकी आध्यात्मिक गति भी ऊर्ध्व दिशा में, अर्थात् भगवद् धाम या कम से कम स्वर्ग को होती है।

2. मध्यरेता :

जो व्यक्ति अपने वीर्य का उपयोग संतान प्राप्ति हेतु मात्र विवाह संस्कार के अन्तर्गत अपनी पत्नी के गर्भ में दान करता है उसे मध्यरेता कहते है। ऐसे व्यक्ति यदि अपने गृहस्थ धर्म के आचरण में युक्त रहे तो उन्हें भी ऊर्ध्व रेता के समान भगवद् धाम या स्वर्ग की प्राप्ति होती है। और यदि सभी कर्म न भी कर पाएँ तो भी सिर्फ़ अपने इस विवाहित ब्रह्मचर्य के पालन मात्र से भी कम से कम मनुष्यों में उच्च कोटि के समृद्ध परिवार में जन्म प्राप्त होता है।

3. अधोरेता :

जो व्यक्ति अपने वीर्य की रक्षा न करे, न ही उसका उपयोग गृहस्थ धर्म में संतान प्राप्ति के लिए करे, अपितु उसको निकालकर उसका व्यय व नाश करता है उसे अधोरेता कहते है। और ऐसे व्यक्तियों को निश्चित ही पाताल व नरक आदि निम्न लोक या फिर प्राणी, पक्षी, कीट आदि निम्न योनियों में जन्म मिलता है।

यो विप्रः पुंसि संसर्ग स्वदारेषु रतिं मुखे।

कुर्याद् यदिह पापात्मा तद्रेतः क्लीबतामगात् ।।

यमलोकमुपागम्य तत्र वासः सदा भवेत् ।

तस्यैव निष्कृतिर्नास्ति पुनः संस्करणं विना ।।

– मार्कण्डेयस्मृति, देवलस्मृति 1733

‘वह पुरुष जो अपने वीर्य को अपनी पत्नी की योनि के अतिरिक्त कहीं भी और प्रवाहित करता है उसे चोरी व ब्रह्म-हत्या का पाप लगता है और यमलोक की यातना के पश्चात निम्न योनियों में जन्म प्राप्त करता है।’

अतः यह निरंतर ध्यान रखें कि आपका वीर्य ही आपके प्राण हैं। जिस भी दिशा में आपका वीर्य जाएगा उसी दिशा में आपके प्राण जाएँगे। अतः अपने वीर्य की गति उसी दिशा में करें जिस दिशा में आप अपने प्राण की गति चाहते हैं।

और यदि इतना जानने के बाद भी अपने आपको रोक नहीं पा रहे हो और यह सोच रहे हो कि, ‘मैं तो जो कर रहा हूँ अकेले में कर रहा हूँ, किसे जान पड़ेगा कि मैंने क्या किया? कब किया?’

तो इतना जान लीजिए कि शास्त्रों के अनुसार मनुष्य के समस्त कर्मों के मुख्य 12 साक्षी होते है जो सतत उसके कृत्यों पर नज़र रखे हुए हैं।

सूर्योऽग्निः खं मेरुद्देवः सोमः संध्याहनि दिशः।

कं कुः स्वयं धर्म इति होते दैह्यस्य साक्षिणः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण 6.1.42

‘सूर्य, अग्नि, आकाश, वायु, देवता, चंद्रमा, शाम, दिन, रात, दिशाएं, जल, भूमि और अंत में स्वयं परमात्मा सभी जीव की गतिविधियों के साक्षी हैं।’

तो अब से जब भी आप पोर्न, हस्तमैथुन तथा नशा आदि कृत्य करने जा रहे हो इस श्लोक को याद कीजिए और जानिए कि आप अकेले नहीं हो, आपके आसपास 12 लोग खड़े हैं और आप ही को देख रहे हैं कि आप इस क्षण में क्या कर रहे हो। इन्हीं 12 लोगों के साक्ष्य से ही यमराज आपके कृत्यों की पुष्टि करते हैं और आपको आपके किए का प्रतिफल देते हैं।

और इनके उपरांत उच्च लोकों में बैठे आपके पूर्वज भी आपको धिक्कारतें हैं क्योंकि आपके कृत्य न ही केवल उनकी आने वाली पीढ़ी पर असर करता है अपितु आपके पूर्वजों की आध्यात्मिक गति पर भी असर करते है। आप की भगवद् प्राप्ति आपके पूर्वजों को भी उनके कर्म फलों से मुक्ति दिलाकर उन्हें भगवद्माप्ति की ओर ले जाती है।

ऊपर से आपके नित्य गुरु व आपके हृदय में बैठे परमात्मा भी आपको इन कृत्यों को करते देख आपके प्रति निराशा अनुभव करते हैं। और आप दीक्षित शिष्य हैं तब तो आपके इन कर्मों का फल आपके गुरु को भी भुगतना पड़ेगा

तो अपने लिए नहीं तो कम से कम अपने पूर्वजों, गुरु और परमात्मा के प्रति आपकी ज़िम्मेदारी जानकर इन कृत्यों से दूर रहें।

अब यदि आप नास्तिक हो और इन आध्यात्मिक नुकसान की आपको कोई चिंता नहीं है तो अभी बात करते हैं उस नुकसान की जिसकी सबको चिंता रहती है।

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