पल्लवन ( Pallawan ) – हिन्दी व्याकरण

पल्लवन – Pallawan in Hindi

हिन्दी रचना शास्त्र में पल्लवन से तात्पर्य भाव-विस्तार से लिया जाता है जिसे वृद्धीकरण या संवर्द्धन भी कह सकते हैं। यह संक्षिप्तीकरण से बिल्कुल विपरीत होता है।

इसमें प्रस्तुत सूक्ति, कहावत, वाक्यांश आदि का विस्तार करके प्रस्तुत किया जाता है, जिसमें ‘गागर में सागर’ की कहावत को चरितार्थ करते हुए अत्यंत मौलिक शब्दावली में तथ्यात्मक रूप से प्रस्तुत किया जाता है।

पल्लवन या वृद्धीकरण के सामान्य नियम :-

1 . सूक्ति की मूल भावना को विस्मृत नहीं करना चाहिए।

2 . उक्ति या कहावत का केन्द्रीय भाव सहज प्रस्तुत होना चाहिए।

3 . अपेक्षित विषय की पुनरावृत्ति से बचना चाहिए।

4 . मूल भाव को स्पष्ट करने के लिए संदर्भित उक्ति या लोकोक्ति को प्रस्तुत किया जा सकता है।

5 . वृद्धीकरण में भाषा सरल, सहज एवं मौलिक होनी चाहिए। इसमें आलंकारिक भाषा के प्रयोग से बचना चाहिए।

6 . वृद्धीकरण का आकार एक निश्चित शब्द सीमा में ही होना चाहिए। सामान्यतया इसे आठ पंक्ति का आदर्श माना जा सकता है।

7 . वृद्धीकरण करते समय आवश्यकता होने पर उसे एक से अधिक अनुच्छेदों में विभाजित किया जा सकता है।

8 . वृद्धीकरण में मूल भावना का निहितार्थ सरल व्याख्या में प्रस्तुत करते समय स्वयं की ओर से मूल्यांकन या निर्णय नहीं करना चाहिए।

9 . वृद्धीकरण को अन्य पुरुष शैली में ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

10 . सूक्ति या कहावत का पल्लवन करते समय उसे ध्यान से पढ़कर एकाग्र भाव से चिंतन-मनन करके ही लिखना चाहिए।

पल्लवन (Pallawan) – 1

दुःख की पिछली रजनी बीच।

विकसता सुख का नवल प्रभात॥

सुख और दुःख मानव जीवन के दो पक्ष हैं, ठीक सिक्के के दो पहलुओं की भाँति। जिस तरह रात्रि के पश्चात् प्रभात होता है, उसी तरह मनुष्य के जीवन में दुःख के बाद सुख आना तय है।

क्योंकि परिवर्तन प्रकृति का नियम है। दु:ख रात्रि के अंधकार की तरह है और उसी अंधकार में से उजाले का प्रस्फुटन होता है। इसलिए दुःख परम सत्य तो है परन्तु वह अटल नहीं।

मनुष्य को बिना अवसाद एवं हताशा के इस चक्र का सामना करना चाहिए। जैसे पतझड़ के बाद बसंत में नवपात प्रस्फुटित होते हैं, उसी प्रकार दुःख के पश्चात् सुख का आगमन भी सुनिश्चित है। जीवन में इस चक्र का संतुलन ही जीवन को बराबर चलायमान रखता है।

कविवर पंत ने लिखा है –

“जग पीड़ित है, अति सुख से।

जग पीड़ित है, अति दुःख से।”

पल्लवन (Pallawan) – 2

जो शक्ति तोप तलवार और बम के गोले में नहीं पाई जाती, वह साहित्य में पाई जाती है।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि आज तक विश्व में जितने भी युद्ध हुए हैं उनका अंत, विध्वंस, निराशा एवं मृत्यु के रूप में ही हुआ है। किन्तु साहित्य, शास्त्र एवं महापुरुषों की उक्तियाँ शताब्दियाँ बीतने के पश्चात् भी आज भी वैसे ही जीवित है।

क्योंकि जो प्रेरणा व शक्ति साहित्य में पाई जाती है उसकी तुलना में तोप, तलवार या बम केवल क्षणिक भय के हथियार हैं। जिनके आधार पर विनाश किया जा सकता है, विकास नहीं।

यही कारण है कि हमें सत्य, धर्म, नीति, मर्यादा एवं सहिष्णुता का पाठ जो साहित्य के माध्यम से सीखने को मिलता है वहीं युद्धों ने नई पीढ़ी के सम्मुख केवल बीभत्सा, घृणा, नृशंसता एवं आक्रामकता के ही दृश्य उपस्थित किये हैं।

हिरोशिमा एवं नागासाकी के युद्ध प्रसंग इसके सजीव उदाहरण हैं। अत: साहित्य से सृजनशीलता उत्पन्न होती है।

पल्लवन (Pallawan) – 3

चन्दन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग।

जो मनुष्य स्वभाव स्वभाव से विनम्र, मर्यादित एवं शिष्टतापूर्ण होता है, वह प्रतिकूल परिस्थितियों में दुर्जनों से घिरे रहने पर भी अपनी नैसर्गिक प्रतिभा का हनन नहीं होने देता है।

चंदन का वृक्ष विषैले सर्पो से घिरे रहने पर भी अपनी प्राकृतिक सुगंध को नहीं त्यागता, अपितु सम्पूर्ण वन को महकाता रहता है, उसी प्रकार महान् व्यक्ति दुष्टों के निरन्तर सम्पर्क में रहने पर भी अपनी नैसर्गिक महत्ता एवं उदारता का परित्याग नहीं करते हैं;

भले ही कितने भी विषैले विकार अथवा प्रतिकार उन्हें घेरने की कोशिश करे वे अपने शिष्टता के आवरण को बिल्कुल नहीं त्यागतें। इसीलिए कहा गया है कि “चन्दन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग”।

पल्लवन (Pallawan) – 4

क्रोध का प्रारम्भ मूर्खता से एवं अंत पश्चात्ताप से होता है।

अथवा

क्रोध सत्प्रवृत्तियों को जला डालने वाली अग्नि है।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। जिसमें अनेक मनोविकार समाविष्ट हैं। उनमें से क्रोध भी एक है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने क्रोध को क्षणिक पागलपन तक बताया है।

क्रोध के आवेग में मनुष्य उचित-अनुचित का भेद नहीं रख पाता है एवं विवेक खो कर अनिष्ट कर बैठता है। परिणामतः वह स्वयं को भी नुकसान पहुंचाता है एवं परिवार, समाज एवं राष्ट्र के विपरीत आचरण करता है।

कुंठित मन एवं हताश व्यक्तित्व को क्रोध शीघ्र घेरता है। इसीलिए क्रोध को कमजोर मनुष्य का हथियार माना गया है। किसी महापुरुष ने सच ही कहा है कि “क्रोध का प्रारम्भ मूर्खता से होता है एवं उसका अंत पश्चात्ताप में निहित है।”

पल्लवन (Pallawan) – 5

आत्मविश्वास सफलता की कुंजी है।

आदम युग से ही मनुष्य कुछ न कुछ महान् कार्य करने हेतु प्रवृत्त रहा है, जिसमें उसकी सफलता या असफलता उसके आत्मविश्वास पर टिकी हुई होती है क्योंकि किसी भी कार्य को प्रारम्भ करने से पूर्व मनुष्य में आत्मविश्वास कूट-कूट कर भरा होना आवश्यक होता है।

किसी भी कार्य के बिगड़ाव में या तो बिल्कुल आत्मिक अविश्वास अथवा अति आत्मविश्वास ही प्रमुख दूरी होता है। इसीलिए डॉ. कलाम ने भी कहा है कि “भारत की युवा पीढ़ी को 21वीं शताब्दी का चरम छूना है तो उसे आत्मविश्वास से स्वयं को आप्लावित करना होगा।”

प्रायः देखा गया है कि मनुष्य किसी कार्य के लिए प्रारम्भिक योजना बनाता है, संसाधनों को जुटाता है एवं उचित परिश्रम भी करता है किन्तु आत्मविश्वास डांवाडोल होने के कारण वह यथेष्ट परिणाम प्राप्त नहीं कर पाता है।

अंततः उसे पराजय व निराशा ही हाथ लगती है। वस्तुतः ‘आत्मविश्वास ही सफलता की कुंजी है‘।


हिंदी व्याकरण – Hindi Grammar


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