
मेरी रेल यात्रा पर निबंध (Meri Rail Yatra Par Nibandh in Hindi)
गर्मी की छुट्टी थी। मेरे भाई ने मुझे कलकत्ता आने के लिए आमंत्रित किया। मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। वाह ! बहुत दिनों के बाद मैं पटना से बाहर जा रहा हूँ ! मैं महान नगर कलकत्ता को देखूंगा !
प्रातःकाल का समय था। मैंने एक टिकट खरीदा और तूफान एक्सप्रेस के एक दूसरे दर्जे में प्रवेश कर गया। मैं खिड़की की ओर की सीट पर बैठ गया।
गाड़ी खुल गई। शीघ्र ही वह रफ्तार में हो गई और बहुत द्रुतवेग से जाने लगी। छोटे-छोटे स्टेशनों पर बिना रुके ही वह बढ़ती गई। दोनों तरफ हरे-भरे खेत थे। कभी-कभी एक पहाड़ी या नाला दीख पड़ता था ।
मेरे डिब्बे में अधिक यात्री नहीं थे। उनमें कुछ समाचारपत्रों के प्रातः संस्करण को पढ़ रहे थे। कुछ गप्प कर रहे थे और मेरी तरह कुछ लोग बाहर के दृश्यों का आनंद ले रहे थे। गाड़ी मोकामा में रुक गई। मैंने जलपान किया। कैंटीन के नौकर को मैंने आदेश दिया कि वह झाझा में मुझे भोजन देगा।
गाड़ी फिर चल पड़ी। टिकट-परीक्षक आया और उसने टिकटों की जाँच की। एक आदमी बिना टिकट का था। उसने भाड़ा अदा कर दिया और टिकट परीक्षक ने उसके लिए एक टिकट बना दिया। मोकामा घाट में मंदगति से प्रवाहित होती हुई गंगा को मैंने देखा । प्रातःकालीन सूर्य किरणों में हाथीदह का गंगा पुल भव्य दीख रहा था।
रह-रहकर फेरीवाले अपनी वस्तुओं को बेचने के लिए डिब्बे के अंदर आते थे। कभी-कभी कोई भिखमंगा आ जाता था। वह गा-गाकर भीख माँगना शुरू कर देता। अकसर विपरीत दिशा से गाड़ी तीर की तरह हमलोगों के बगल से होकर निकलती थी। उस समय सभी चिहुँक जाते थे ।
झाझा में मेरा भोजन आया। मैं भूखा था, इसलिए मैंने भोजन का आनंद लिया। उसकी कीमत भी अधिक न थी । गाड़ी तीव्र वेग से आगे बढ़ी। मैं ऊँघने लगा। अचानक दुर्गापुर का नाम मेरे कानों में पहुँचा।
मैंने उठकर बाहर की ओर देखा। गाड़ी आगे बढ़ी। सर्प की तरह सरकता हुआ ग्रांड ट्रंक रोड दिखाई पड़ता था। हमलोग बर्दवान पहुँच गए। अब एक विद्युत इञ्जन इस गाड़ी को खींचने लगा और गाड़ी की रफ्तार बहुत तेज हो गई।
गोधूलि हो गई। श्रांत गाड़ी की चाल धीमी पड़ गई और हावड़ा स्टेशन पर आकर वह लग गई। मैं गाड़ी से उतरकर प्लैटफार्म से बाहर निकल आया हुगली नदी की दूसरी ओर विशाल नगर स्थित था।
Final Thoughts –
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