
जी हाँ,
प्राकृतिक रूप से तो सिर्फ़ मैथुन (Sex) ही वीर्य को शरीर से निकालने के लिए सक्षम होता है। हालाँकि यह दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि चेतना की दुर्गति से हमने शरीर से वीर्य को निचोड़ लेने के लिए हस्तमैथुन व पोर्न जैसे नवीन तरीके बना दिये है।
परंतु इस विषय को समझने की शुरुआत हम प्राकृतिक क्रिया से ही करेंगे।
जो कि है, मैथुन (Sex)
परंतु आखिर, क्या है मैथुन? या संभोग? या यौन क्रिया? या Sex?
सरल शब्दों में मैथुन प्रजनन हेतु की गई वो प्रक्रिया है जिसमें एक पुरुष एक स्त्री के संपूर्ण शारीरिक संपर्क में आकर उसकी योनि में अपने जननांग से वीर्य बीज का दान करता है, जिससे संतान की प्राप्ति हो सके।
यह हो गई हेतु के लक्ष्य की गई मैथुन की व्याख्या।
परंतु यदि वीर्य को लक्ष्य में रखकर मैथुन की व्याख्या करनी हो तो ‘मैथुन’ शब्द अपने आप में पूरी प्रक्रिया की व्याख्या कर देता है।
मैथुन शब्द आता है ‘मंथन’ (Churning) शब्द से। जिसका अर्थ है मथना, जैसे कि समुद्र के मंथन से देवों को अमृत मिला था, और दूध के मंथन से हमें मक्खन मिलता है, वैसे ही शरीर के मंथन से वीर्य मिलता है।
दूध में मक्खन दिखता नहीं है,
पर उसकी बूँद बूँद में विद्यमान होता है।
वैसे ही शरीर में वीर्य दिखता नहीं है,
परंतु उसके कोष कोष में विद्यमान होता है।
जब दूध में से मलाई निकाल ली जाए तो दूध पतला और रसहीन हो जाता है, मक्खन निकाल लिया जाए तब तो दूध ही नहीं रहकर छाछ बन जाती है।
वैसे ही जब जब पुरुष के शरीर में से वीर्य निकलता है तब तब उसके शरीर से पौरुष निकल रहा होता है। जिसका विश्व में सिर्फ़ एक ही सार्थक उपयोग है, जो कि है संतान प्राप्ति।
कोई भी अलग उद्देश्य से किया गया शरीर का मंथन शरीर के अमूल्य प्राण, ऊर्जा, बीज, और अमृत नाश मात्र है।
यह कुछ वो बात हो गई कि, देवों और दानवों ने सहस्रों वर्षों तक दिन रात समुद्र मंथन किया और जब अमृत आया तो उसे नाली में फेंक कर फिर पुनः समुद्र मंथन करने लगे।
मूर्खता है ना? वही तो समझा रहे हैं हम।
हम यही सोचकर मैथुन करते है कि इसमें परम आनंद मिल जाएगा। परंतु यदि सही में मैथुन में इतना आनंद होता तो वैश्याएँ दुनिया के सबसे आनंदित लोगों में से एक होतीं। परंतु सत्य एकदम विपरीत ही देखने को मिलता है।
इसीलिए हम हर बार यह सोचकर मैथुन या हस्तमैथुन करते हैं कि, “इस बार तो उत्तम आनंद मिलेगा, भले पिछली बार नहीं मिला था, और न ही उसके पिछली बार मिला था, और न ही उसके पिछली बार, परंतु इस बार ऐसा प्रतीत हो रहा है कि उत्तम आनंद मिलेगा ही।’
फिर कृत्य करने के तुरंत पश्चात ही पता चलता है कि, “ये तो एकबार फिरसे उसी खाई में आकर गिर गए जिसमें हज़ारों बार गिर चुके हैं।’
यही कारण है कि जब अनावश्यक वीर्यपात होता है, तब भारी मात्रा में ग्लानि (Guilt) का अनुभव होता है।
परंतु वीर्यपात से ग्लानि (Guilt) क्यों होती है?
सत्य यह है कि,
वीर्यपात से ग्लानि नहीं होती है।
वीर्य नाश से होती है।
जब आप गर्भाधान के हेतु से मैथुन करते हो तब जब वीर्य योनि में स्खलित होता है तब स्त्री और पुरुष दोनों को अत्यंत ही आनंद की अनुभूति होती है।
क्यों?
क्यूँकि यहाँ वीर्य का उपयोग हुआ है, व्यय नहीं।
परंतु जब हम वीर्य का सार्थक उपयोग न करके व्यय करते हैं, तब हमें भारी मात्रा में ग्लानि होती है। और यह ग्लानि परमात्मा करवाते हैं।
क्यूँकि यहाँ आप न ही मात्र जीवन में पुरुषार्थ करने के लिए परमात्मा का उधार दिया वीर्य आप व्यय कर रहे हो, परंतु अपने प्राण क्षीण करके अपने आपको मृत्यु के समीप धकेल कर अपनी आत्मा के प्रति घोर अपराध कर रहे हो।
परंतु,
यदि ऐसा करने से ग्लानि ही मिलनी थी तो, हमें कामवासना होती ही क्यों है?
क्या कामवासना होना अप्राकृतिक है?
हाँ और नहीं। हाँ इसलिए क्यूँकि हमारे मूल सत् चित आनंद आत्मा स्वरूप के लिए कामवासना सहज नहीं है, अप्राकृतिक है। हमारे उस मुक्त रूप में हमें इन वासनाओं का शिकार नहीं होना पड़ता।
और नहीं इसलिए क्यूँकि हम अभी मुक्त नहीं परंतु बद्ध जीव हैं। हम भौतिक प्रकृति के गुणों से इस शरीर में बंधे हुए हैं।
इसीलिए हमें इन शारीरिक वासनाओं को सहन करना पड़ रहा है। और इसी कारण इस कामवासना के त्याग मात्र से साधक मुक्ति के अत्यंत समीप आ जाता है।
परंतु यदि इससे आकर्षित होना ही नहीं था तो,
मैथुन भगवान ने क्यों बनाया?
हमारी इच्छा की पूर्ति के लिए।
जी हाँ, हमारी इच्छा हुई थी शारीरिक भोग करने की। जो कि हम आध्यात्मिक जगत में नहीं कर सकते। इसीलिए भगवान ने हमारी सबसे तगड़ी इच्छा को ही इस भौतिक सृष्टि के सर्जन और पालन का केंद्र बना दिया, यौन क्रिया।
और उसी यौन क्रिया के संयम को इस दुःखालय से बाहर निकलने का द्वार भी बना दिया। जिसे कहते है, ब्रह्मचर्य।
इसीलिए आचार्यगण कहते हैं कि,
हमारा भौतिक संसार में होने का सबसे बड़ा कारण ही है कामेच्छा।
यदि वह नहीं होती तो हम यहाँ नहीं होते और जब तक वह है
तब तक इस भौतिक जगत से हम बाहर नहीं निकल सकते।
यही बात उस प्रश्न का भी जवाब दे देती है कि…
मैथुन की इच्छा इतनी प्रबल क्यों है?
क्योंकि भौतिक जगत में उससे बड़ा कोई आनंद नहीं है। सभी इंद्रिय सुखों में सर्वोच्च सुख है मैथुन सुख।
यहाँ तक कि समस्त सुखों में बस यह एकमात्र सुख है जिसे स्वर्गीय स्तर का सुख कहा गया है। क्योंकि यह एक ही सुख ऐसा है जिसमें समस्त पाँच प्रकार के इंद्रिय विषय सुखों की प्राप्ति होता जाती है। जो कि है…
1. शब्द : Sound
2. स्पर्श : Touch
3. रूप : Beauty
4. रस : Taste
5. गंध : Smell
दुनिया में कोई अन्य ऐसा कृत्य नहीं है जिसमें पाँचों इंद्रियों के विषय सुखों की प्राप्ति एक साथ हो सके। परंतु सर्वोच्च इंद्रिय सुख होने के पश्चात भी अंत में तो यह जड़ इंद्रियों का सुख ही है।
और भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जड़ इंद्रियों से उच्च मन, उससे उच्च बुद्धि, उससे उच्च अहंकार और उससे भी उच्च आत्मा होती है। अतः जब मनुष्य मन, बुद्धि, अहंकार और उनसे भी उत्तम आत्मा के स्तर का सुख प्राप्त कर लेता है तो उसे जड़ेन्द्रियों के सुखों में रुचि नहीं रहती है।
वैसे ही जैसे किसी ने जीवन भर मात्र ठंडी सूखी रोटी ही खाई हैं। वो भी प्रतिदिन बस एक ही बार। तो वो प्रतिदिन उस घड़ी की प्रतीक्षा करता है कि कब उसे वह सूखी रोटी मिले।
परंतु यदि आप उसको एक बार घी से लत पत गरम गरम रोटी खिला देते हो तो फिर उसको ठंडी सूखी रोटी में कोई रुचि नहीं रहती है। क्योंकि अब उसने उच्च स्तर का सुख चख लिया है।
ऐसे ही जब व्यक्ति को आत्मा का सुख मिल जाता है तो उसे जनेन्द्रियों का सुख ठंडी सूखी रोटी के समान लगने लगता है। अतः उसका त्याग उसके लिए अत्यंत ही सरल हो जाता है। जिसके बारे में हम आगे बात करेंगे।
परंतु अभी बात करते हैं कि…
ब्रह्मचर्य कब खंडित होता है?
ब्रह्मचर्य तब से खंडित होना शुरू हो जाता है जब हम स्त्री भोग का प्रथम विचार करते हैं। मैथुन के विचार से लेकर मैथुन की क्रिया तक के आठ चरणों को शास्त्रों में आठ प्रकार के मैथुन बताए गए हैं। जिन्हें कहते है,
अष्ट मैथुन
श्रवणं (स्मरणं) कीर्तनं केलिः प्रेक्षणं गुह्यभाषणं
संकल्पोध्यवसायश्च क्रियानिवृत्तिरेव च
1. श्रवणं व स्मरणं : मित्र, संबंधी या इंटरनेट आदि से स्त्रियों के बारे में सुनना, फिर उसके बारे में चिंतन करना।
2. कीर्तन : उन स्त्रियों के रूप, गुण और अंग प्रत्यंग के बारे में चर्चा करना, उसके गीत गाना, उसके बखान करना या औरों को बताना।
3. केलिः स्त्रियों के साथ हंसी, मजाक, मस्ती (Flirting) व खेल खेलना।
4. प्रेक्षणं : स्त्री को एकांत में चोरी से, सार्वजनिक स्थल में ऊँट की तरह गर्दन उठा कर ताकना व फ़ोन आदि में भोग दृष्टि से देखना।
5. गुह्यभाषणं : स्त्री के साथ बार – बार आना – जाना, उनके साथ घूमना, एकांत में बातचीत करना, फ़ोन वीडियो कॉल आदि पर बातें करना।
6. संकल्प : जान बूझकर स्त्रियों के गंदे फोटो देखकर, सिनेमा के कामचेष्टापूर्ण (Erotic) दृश्य देखकर उसकी कल्पनाएँ करना।
7. व्यवसाय : किसी अ-प्राप्य स्त्री को प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करना।
8. क्रियानिवृत्ति : स्त्री के साथ प्रत्यक्ष सम्भोग या हस्त मैथुन आदि करना।
मैथुन के यह सभी आठ चरण ब्रह्मचर्य नाश के चरण हैं।
इनमें प्रवृत्त होने वाले को अपने आपको ब्रह्मचारी नहीं कहना चाहिए। और जो ब्रह्मचारी बनना चाहता है। उसे इन अष्ट मैथुन में किसी भी प्रकार प्रवृत्त नहीं होना चाहिए।
एतन्मैथुनमष्टगं प्रवदन्ति मनीषिण;
विपरीतं ब्रहमचर्य एतत एवाष्टलक्षणम – दक्षस्मृति ७/३१-३३
अर्थात्
इन्हीं आठ लक्षणों के विपरीत लक्षण को जीवन में उतारने वाले को अखंड ब्रह्मचारी कहते हैं।
अतः आदर्श ब्रह्मचारी में इन आठ लक्षणों में से एक भी लक्षण नहीं पाया जाना चाहिए क्योंकि इनमें से एक भी लक्षण हमें और हमारे ब्रह्मचर्य व्रत को नष्ट भ्रष्ट करने के लिए पूर्ण रूप से समर्थ है।
परंतु आख़िर क्यों?
क्योंकि आप ही विचार कीजिए कि, शरीर में आख़िर…
वीर्य कब बनता है?
लोगों में यह सामान्य मिथ्या धारणा है की, वीर्य तो तभी बनता और निकलता है जब प्रत्यक्ष मैथुन करते हैं। परंतु शरीर में वीर्य बनने की शुरुआत ऊपर बताए अष्ट मैथुन के प्रथम चरण से ही हो जाती है।
जैसे ही कामवासना का मन में मनोमंथन शुरू होता है, हमारी इंद्रियाँ शरीर का मंथन करके उसके प्रत्येक कोषों से वीर्य मथना शुरू कर देता है।
और यदि उस मनोमंथन के पश्चात कृत्य नहीं करते हैं तो वही मथा हुआ वीर्य स्वप्न दोष के माध्यम से शरीर से निकल जाता है।
तो,
क्या समझें?
यही कि, सिर्फ़ हस्तमैथुन न करना (Nofap) ब्रह्मचर्य नहीं है, सिर्फ़ मैथुन (Sex) न करना भी ब्रह्मचर्य नहीं है, सिर्फ़ वीर्य को न गिरने देना (Semen Retention) भी ब्रह्मचर्य नहीं है, और सिर्फ़ अपने वीर्य को बाह्य प्रभाव से दबाकर नशा, जुआ, सॉफ़्ट पोर्न जैसी अन्य विकार युक्त आदतों में बने रहना भी ब्रह्मचर्य नहीं है।
तो फिर,
क्या है ब्रह्मचर्य?
महाभारत में व्यासदेव बताते है कि, ‘इंद्रिय सुखों का स्वैच्छिक त्याग करके, अपनी इंद्रियों पर संपूर्ण नियंत्रण पाकर, अपने प्राणों की वृद्धि करके पुनः अपने आध्यात्मिक रूप की प्राप्ति करने की प्रक्रिया को कहते है,
ब्रह्मचर्य
परंतु अभी प्रश्न यह आता है कि……….. क्यों करें ब्रह्मचर्य?