क्या है ब्रह्मचर्य? जाने ब्रह्मचर्य का सम्पूर्ण ज्ञान

इससे पहले की हम यह जाने कि… क्या है ब्रह्मचर्य?

आइए यह जानते हैं कि.. ब्रह्मचर्य क्या नहीं है..

सिर्फ़ हस्तमैथुन (Masturbation) न करना ब्रह्मचर्य नहीं है।

सिर्फ़ मैथुन (Sex) न करना भी ब्रह्मचर्य नहीं है।

और मैथुन व हस्तमैथुन करते समय वीर्य को न गिरने देना यह तो बिलकुल ही ब्रह्मचर्य नहीं है। यह तो मूर्खता ही है।

यह सब बस ब्रह्मचर्य की छिछली (Shallow) अवधारणाएँ हैं, जो कि आजकल पाश्चात्य (Western) देशों में वीर्यरक्षा के महत्त्व को जानने के बाद बनाई गई हैं। इन्हें प्रसिद्ध रूप से No Fap या Semen Retention के नाम से जाना जाता है।

जो कि मात्र एक बाह्य नियंत्रण की क्रिया है। जबकि ब्रह्मचर्य एक संपूर्ण जीवनशैली है।

इन सब में आप बस अपने वीर्य को बाह्य प्रभाव से दबाकर रखो और बाक़ी हर प्रकार के विकार युक्त आदतें जैसे नशा, जुआ तथा सॉफ़्ट पोर्न सभी में बने रहें तो भी चलता है। जोकि ब्रह्मचर्य में नहीं चलता है।

ब्रह्मचर्य का अर्थ है शरीर, मन और जीवन पर संपूर्ण नियंत्रण।

हालाँकि ऐसा भी नहीं है कि यह सभी एकदम गलत हैं। व्यभिचार में लगने से तो हज़ार गुना अच्छे हैं। और इनसे भी फ़ायदे तो होते ही हैं। परंतु इनसे हम ब्रह्मचर्य के समान परिणाम की अपेक्षा नहीं रख सकते।

ब्रह्मचर्य वह विधि है जिसके माध्यम से बड़े बड़े ऋषि मुनि, राजा महाराजाओं व साधकों ने दिव्य शक्तियाँ, सिद्धियाँ और उच्चतम लोकों की प्राप्ति की है।

और इसी की सहायता से उन्होंने जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य को भी प्राप्त किया है।

अभी प्रश्न यह आता है कि ऐसा क्यों? ऐसी तो क्या बड़ी बात है ब्रह्मचर्य में, कि उससे इतने बड़े बड़े परिणामों की प्राप्ति होती है?

इसे समझने के लिए हमें सर्वप्रथम इस भौतिक संसार को और उसमें हमारे अस्तित्व को समझना होगा।

तो इस ‘भौतिक संसार में हमारे अस्तित्व का कारण है, हमारी इस प्रकृति को भोगने की तीव्र इच्छा।

जो कि हम हमारी इंद्रियों से करते हैं। जैसे –

आँखों से देह और प्रकृति की सुंदरता, जीभ से भोज्य पदार्थों का स्वाद, कानों से शब्द और संगीत की मधुरता, और नाक से सुगंधित द्रव्यों की सुगंध आदि।

परंतु इन सभी इच्छाओं में सबसे अधिक बलशाली है, कामेच्छा।

अपने संपूर्ण शरीर से (मुख्यतः त्वचा और जननेंद्रियों से) किसी और के संपूर्ण शरीर को भोगने की इच्छा। इसीलिए इस प्रक्रिया को भी संभोग कहते हैं, संपूर्ण उपभोग।

जो कि सभी भौतिक सुखों में सर्वोच्च स्थान पर है।

पृथ्वी पर यह एकमात्र ऐसा इंद्रिय सुख है जिसे स्वर्गीय सुख के समान बताया गया है। इसी लिए इसका त्याग सबसे कठिन है। यदि जीवन में आपने कुछ भी पाया है तो इतना जानते ही होंगे कि किसी भी मूल्यवान वस्तु की प्राप्ति करने के लिए किसी और मूल्यवान वस्तु का त्याग आवश्यक है। सरल शब्दों में ‘कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है।’

अतः जीवन में जितना बड़ा फल चाहिए होता है, उतना ही बड़ा त्याग करना पड़ता है।

यह अस्तित्व के सबसे मूलभूत नियमों में से एक है। इसी लिए दुनिया के समस्त उच्च ऐश्वर्यों और आध्यात्मिक ध्येयों की प्राप्ति के लिए सबसे बड़े भोग का त्याग करना आवश्यक हो जाता है। और कामेच्छा से बड़ा भोग, इस भौतिक संसार में है ही नहीं।

इसलिए उसके त्याग से न ही मात्र भौतिक जगत के, परंतु आध्यात्मिक जगत के भी सर्वोच्च सुखों को पाना सरल हो जाता है।

इसीलिए बड़े बड़े ऋषि मुनि और संतगण ब्रह्मचर्य की महिमा गाते हुए थकते नहीं है और किसी विद्यार्थी को विद्यादान देने से पहले ही उसे ब्रह्मचर्य का महत्व समझकर उसका संकल्प दिलवाया जाता है। और आज हम भी वही करेंगे।

पहले ब्रह्मचर्य क्या है ये समझेंगे। फिर उसे क्यों करें ये समझेंगे। फिर उसे कैसे करें ये समझेंगे, और फिर आपको उसका संकल्प दिलवाएँगे।

तो आइए शुरू करते हैं।

ब्रह्मचर्य समझने की शुरुआत होती है हमारे शरीर को समझने से।

हमारा शरीर प्रकृति के पाँच मूलभूत तत्त्वों से बना है। धरती, जल, वायु, अग्नि और आकाश।

मॉडर्न दृष्टिकोण से देखें तो, प्रोटीन, विटामिन, मिनरल्स, फ़ाइबर और कार्बोहाईड्रेट्स।

परंतु इनमें से

कौन सी वो चीज़ है जो शरीर में जीवन भरती है?

कौन सा वो द्रव्य है जो शरीर में से निकल जाने पर डॉक्टर आदि यह घोषित कर देते हैं कि व्यक्ति का देहांत हो गया?

शरीर में से धरती निकल गई? नहीं।

अग्नि निकल गई? नहीं।

प्रोटीन निकल गया? नहीं। विटामिन ख़त्म हो गया? नहीं।

तो फिर क्या है वो,

जो निकल जाता है तो जीवन्त शरीर को मृत घोषित कर दिया जाता है।

वो हैं… प्राण

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