ब्रह्मचर्य तोड़ने के प्रमुख कारण – सम्पूर्ण ज्ञान हिंदी में

आख़िर, क्यों तोड़ता है कोई ब्रह्मचर्य?

जब मनुष्य के जीवन में सर्जनात्मक आदतों की कमी होती है,

तब उसका मन उसे विनाशक आदतों की ओर घसीट कर ले जाता है।

अधिकतर लोग यह मानते हैं कि ब्रह्मचर्य हम तब तोड़ते हैं। जब हमारी कामवासना हम पर हावी हो जाती है।

ग़लत।

आप स्वयं सोचिए, आख़री बार कब आपको बैठे बैठे इस स्तर की तीव्र काम वासना हुई थी कि आपको लगा कि ‘इस बार तो रोक ही नहीं पाऊँगा अपने आपको, संभव ही नहीं है।’ आप जानते हो कि अधिकतर समय आप अपने आपको बड़ी सरलता से रोकने के लिए सक्षम होते हो, परंतु आप रोकते नहीं हो।

क्यों?

क्योंकि उस समय आप …

1. निराशा (Disappointment)

2. रसहीनता / अरोचकता (Boredom)

3. या फिर अकेलापन (Loneliness)

इन तीन में से किसी एक या अधिक भावना में डूबे होते हो। और वो थोड़ी सी कामवासना भी आपको उस निराशा, अरोचकता या अकेलेपन से थोड़े समय के लिए ही सही परंतु मुक्त कराती है। इसी लिए आप उसका सहारा ले लेते हो।

अत्यंत ही कम बार ऐसा होता है कि आपको सच में अत्यंत तीव्र कामवासना सताती है। और जब वो होती भी है तब भी उसका प्राथमिक कारण अधिकतर समय इन तीनों में से ही एक या फिर तीनों होते हैं।

एक बार थोड़ा विचार कीजिए,

आपको कभी ऐसे समय में ब्रह्मचर्य तोड़ने के विचार नहीं आएँगे जब आप,

1. अपने जीवन से संतुष्ट और संपन्न अनुभव करते हो।

2. न ही तब, जब आप किसी कार्य में रोचकता से व्यस्त हो।

3. न ही तब, जब आप अपने मित्रों या परिवार आदि के साथ हंस खेल रहे हों या दिलचस्पी से बात चीत या कार्य कर रहे हों।

ऐसा होगा ही नहीं, संभव ही नहीं है।

क्योंकि हम कलियुग में हैं और हमें लगता है कि हमें प्राथमिक रूप से तीव्र कामवासना सताती है।

परंतु,

कामवासना रजस प्रधान है,

और कलियुग तमस् प्रधान है।

इसलिए कलियुग में किसी का रजस प्रधान होना अत्यंत ही दुर्लभ है। जो रजस प्रधान स्वभाव के होते है उन लोगों में काम वासना अवश्य ही अधिक होती है, परंतु वो लोग अपनी कामवासना की पूर्ति कभी पोर्न और हस्तमैथुन आदि तामसिक क्रियाओं से नहीं करते हैं।

राजसिक स्वभाव वाले लोग कामवासना की पूर्ति के लिए स्त्री प्राप्ति करने का प्रयास करते हैं। यदि वे अधर्मी पुरुष हैं तो वे धर्म की मर्यादा के बाहर स्त्रियों को लुभाकर या बल से उनसे अपनी कामवासना की पूर्ति करते हैं।

और यदि वे धर्मशील पुरुष है, तो वो अपनी पसंद की स्त्री से स्वयंवर आदि में अपनी वीरता दिखाकर उनसे विवाह कर के उसके रक्षण-पोषण की ज़िम्मेदारी उठाकर अपनी पत्नी बनाकर उससे प्रेम जताते हैं।

परंतु आज के समय में अधिकतर कोई इस स्तर के राजसिक स्वभाव का नहीं है। इसलिए यह कहना कि आपको कामवासना सता रही है इसलिए आप पोर्न और हस्तमैथुन आदि आदतों में लगे हो, वो संपूर्ण सत्य नहीं होगा।

सत्य यह है कि,

आप कामवासना में नहीं. तामसिकता में इबे हए हैं।

1. आपके जीवन में न ही हृदय पूर्ण संतोष व आनंद है,

2. न ही आप किसी ऐसे ध्येय की प्राप्ति में लगे हो, जिससे जीवन में रोचकता और उत्साह आए,

3. और न ही आपके किसी से इतने प्रगाढ़ संबंध हैं, कि आप उनके प्रति समर्पण अनुभव कर सको।

और हाँ, यहाँ पर गर्लफ्रेंड बॉयफ्रेंड के संबंध की बात नहीं हो रही है। परन्तु माता पिता, भाई बंधु, मित्र सुहृद, पति पत्नी, संबंधी व गुरु शिष्य आदि संबंध की बात हो रही है।

आप अधिकतर समय तभी पोर्न और हस्तमैथुन आदि कृत्य करते हो जब,

1. जीवन में कोई ध्येय नहीं होता है,

2. ध्येय प्राप्ति का कोई उत्साह नहीं होता है,

3. करने के लिए कोई उद्देश्यपूर्ण रोचक कार्य नहीं होता है,

4. और किसी से प्रगाढ़ समर्पण का संबंध नहीं होता है।

ऐसे में बस अकेले में बैठे बैठे अपने फ़ोन में जो आए वो निरर्थक रूप से देखते देखते बस समय व्यय कर रहे होते हो और अपने आपको ऐसा सोच कर मूर्ख बना रहे होते हो कि,

‘मैं पढ़ाई कर रहा हूँ।’

‘मैं कुछ सार्थक कार्य कर रहा हूँ।’

ऐसे में ही ये पोर्न और हस्तमैथुन आदि की वृत्तियाँ जन्म लेती है।

ऐसा कभी नहीं होता कि,

आप अपनी ध्येय प्राप्ति के लिए दिन रात हृदय से पुरुषार्थ कर रहे हों, आपका शरीर और मन दोनों सतत उसमें व्यस्त हैं, आप लोगों से मिल जुल रहे हों, सार्थक संबंध बना रहे हों, हृदय से सत्संग कर रहे हों, हंस खेल रहे हों और एकदम से मन में ऐसी तीव्र इच्छा आ जाए कि मुझे पोर्न देखकर वीर्यनाश करना है। ऐसा कभी नहीं होता है।

क्योंकि यदि आप यह सब कर रहे हो, इसका अर्थ है कि आप सात्विक और राजसिक गुण में स्थित हो।

और पोर्न व हस्तमैथुन जैसी तामसिक आदतें उन लोगों में रह ही नहीं पाती जो लोग राजसिक या सात्त्विक गुण में स्थित होते हैं।

इसलिए यदि ब्रह्मचर्य तोड़ने वाले इन तीन कारक भावनाओं…

1. निराशा (Disappointment)

2. रसहीनता / अरोचकता (Boredom)

3. और अकेलेपन (Loneliness)

को अपने जीवन से हटा दो, तो आप अपने मन और शरीर को सात्त्विक और राजसिक गुण में ले जाओगे जिससे आपके लिए के लिए ब्रह्मचर्य का पालन अत्यंत ही सहज हो जाएगा।

क्योंकि अंत में,

ब्रह्मचर्य पालन न कर पाने का एक मात्र सबसे बड़ा कारण है,

तामसिक – दिशाहीन जीवन (Inactive Aimless Life) जिसका कारण है।

पौरुष का अभाव (Lack of Masculine excellence) जिसका कारण है,

ध्येय का अभाव (Lack of Purpose in life) और जिसका कारण है,

ज्ञान का अभाव (Lack of Real Knowledge)

और यहाँ हम आजकल के भौतिक ज्ञान (अपरा विद्या) की बात नहीं कर रहे है, हम बात कर रहे हैं आध्यात्मिक ज्ञान (परा विद्या) की।

भौतिक ज्ञान तो आज के अधिकतर युवाओं में भर भर के है। ऊपर से मोबाइल और इंटरनेट के बाद तो युवाओं में भौतिक ज्ञान इतना बढ़ गया है कि शायद ही इतिहास में इतना ज्ञान कभी किसी की उँगलियों के तले रहा हो।

परंतु हम आज देख पा रहे रहे हैं कि,

जितना अधिक एक व्यक्ति मॉडर्न भौतिक ज्ञान लेता है

उतना ही अधिक वो बुद्धिहीन, विवेकहीन, संयमहीन, मर्यादाहीन

और भोगी होकर भगवान व आध्यात्मिकता से दूरी बनाने लगता है।

इसे हम विद्या नहीं कह सकते।

क्योंकि विद्या का प्रथम लक्षण है विवेक।

जिस ज्ञान की प्राप्ति से व्यक्ति में विवेक की वृद्धि न हो उसे

विद्या (Education) नहीं जानकारी (Information) कहते हैं।

और एक विवेकशील व्यक्ति ही अपना, अपनों का और समाज का भला कर सकता है। अविवेकी व्यक्ति कितना भी पढ़ा लिखा हो परंतु न ही अपना भला कर पाता है, न ही अपनों का और न ही समाज का। परंतु जब व्यक्ति को सही ज्ञान मिलता है, तो सर्वप्रथम उसमे विवेक की वृद्धि होती है।

वो संसार को, प्रकृति को, समाज को, और स्वयं को मूल रूप में जानने लगता है। जिससे उस व्यक्ति में भोग वृत्ति का हनन होता है और संयम व मर्यादा की वृद्धि होती है।

अतः यह सिद्ध होता है कि ज्ञान प्राप्ति से ध्येय धारण होता है, ध्येय प्राप्ति के लिए किए कर्म से पौरुष की वृद्धि होती है, और पौरुष की वृद्धि से जीवन में से तामसिकता का नाश होता है।

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