
3. शरीर की सफ़ाई (Desexualising Body)
वर्षों के वीर्यनाश से व्यक्ति की प्रत्येक इंद्रियों में तामसीकता घर कर लेती है। जब तक उसको संपूर्ण रूप से निकाला नहीं जाता तब तक ब्रह्मचर्य का पालन कठिन लगता है। जो शरीर से तामसिकता की सफ़ाई हो जाने पर सरल हो जाता है। इस सफ़ाई के तीन आवश्यक चरण है,
1. शारीरिक श्रम
- नियमित रूप से शरीर से श्रम कराएँ। अखाड़ा, Gym, केलिस्थेनिक्स, कुश्ती, बॉक्सिंग, घुड़सवारी, योग, तलवार बाज़ी, शूटिंग आदि में से कम से कम किसी एक शौख़ को सक्रिय रूप से पालें। और अपने आसपास के पुरुषों को प्रेरित करके एक स्वस्थ स्पर्धात्मक भाईचारा बनाएँ। इसमें जो शारीरिक, मानसिक और सामाजिक आनंद मिलेगा वो कहीं और नहीं मिलेगा।
- कम से कम एक लड़ने की कला सीखें।
- अपने शरीर को शस्त्र के समान कठोर बनाएँ।
- शरीर को आलस्य प्रेरित नहीं परंतु श्रम प्रेरित आराम दें।
- ठंडे पानी से नहाएँ। दिन की शुरुआत में किया 1 मिनट का ठंडा स्नान भी आपके मन और शरीर को पूरे दिन लिए तैयार कर देगा।
2. मिताहार
- संपूर्ण शरीर के स्वास्थ्य का प्राथमिक स्रोत पाचन तंत्र का स्वास्थ्य है। अतः अपने पाचन तंत्र को समझें और उसको स्वस्थ बनाएँ।
- शुद्ध सात्त्विक प्राकृतिक आहार लें।
- फ़ास्ट फूड, तैलयुक्त और अधिक मसालेदार भोजन का त्याग करें। □ शुद्ध देसी गाय के दूध और घी के उत्पादनों का सेवन करें।
- नारियल पानी, शुद्ध देशी मधु (Honey) आदि का सेवन करें।
3. प्राकृतिक जीवन ।
- प्रतिदिन कम से कम 1 घंटा सूर्य प्रकाश शरीर को दिलाएँ।
- नंगे पैर घाँस और मिट्टी पर घूमने की आदत डालें।
- गाय, घोड़े, बंदर, पंछी आदि जीवों के आसपास रहा करें।
- यदि गौसेवा, घुड़सवारी, पशु सेवा आदि कर सको तो और उत्तम है।
और सबसे आवश्यक यह है कि, अपने डर का सामना करके नियमित कोई कठिन काम करें। क्यूँकि पुरुष बने ही हैं कठिन काम करके जीवन के हर पहलू में विजय प्राप्त करने के लिए। न की स्क्रीन पर नग्न स्त्रियों को देखकर लार टपकाने के लिए।
अपने वीर्य का ऊर्जावस्था में ही उपयोग कर लें। वरना बीजावस्था में परिवर्तित होकर उसका नाश हो ही जाएगा। यदि नहीं समझ आया कि क्यों? तो आइए एक उदाहरण से समझाते है…
- आपके दयालु पिता चाहते हैं कि आप जीवन में सफल हो। और इसके लिए वे आपकी सहायता भी करना चाहते हैं। परंतु सब कुछ तैयार नहीं दे देना चाहते। इस लिए वे प्रतिदिन आपके बैंक अकाउंट में 10,000 रुपये देते हैं जिसका उपयोग करके आप अपने ध्येय की प्राप्ति करके अपना जीवन सफल बनाओ।
- परंतु शर्त यह है कि उपयोग न होने पर वो धन नाली में बह जाएगा और दूसरे दिन उससे कम धन मिलेगा। परंतु यदि बिना व्यय किए सारा उपयोग कर लिया तो दूसरे दिन अधिक धन मिलेगा।
- अब आप इस धन का प्रतिदिन अच्छे से उपयोग करके अपना व्यापार और जीवन बना सकते हो, या प्रतिदिन इसको नाली में बहाकर अंत में अपना बैंक शून्य करके अपनी मृत्यु ला सकते हो।
- यहाँ परमात्मा आपके वे दयालु पिता हैं, आपका वीर्य और ऊर्जा आपका बैंक बैलेंस है, और नाली आपकी वीर्यनाश की आदतें है।
अभी आप सोच लीजिए कि आपको परमात्मा के दिये इस धन का सदुपयोग करके जीवन समृद्ध करना है या उसे प्रतिदिन नाली में बहाकर व्यर्थ करना है?
क्योंकि ब्रह्मचर्य संयम कोई एक पृथक कार्य नहीं है, परंतु बड़े बदलाव का एक भाग मात्र है।
जिसमें आपको सस्ते त्वरित सुखों से अपनी चेतना को उठाकर उसे उच्च स्तर के सुख की प्राप्ति की ओर ले जाना होगा। और उसके लिए आपको अपनी संपूर्ण विचारशैली और जीवनशैली बदलनी होगी।
और यदि इंद्रिय संयम की बात करें तो,
इंद्रिय संयम का संपूर्ण विज्ञान आपके भोजन मात्र में छिपा है। अतः भक्तदास वामन अपने प्रश्नोत्तर में कहते है कि,
निकम्मा कौन है?
पेटू।
महापुरुष की पहचान क्या है?
जो अपने आप को सबसे छोटा समझे।
महापुरुष कैसे बनें?
मन को वश में करने से।
मन वश में कैसे होय?
कम खाने से।
कम खाना कैसे सीखें?
आहार थोड़ा थोड़ा घटाने से।
आहार कैसे घटे?
रोज़ सादा और प्राकृतिक भोजन करने से।
सादा भोजन कैसे प्रिय लगे?
सिर्फ़ भूख के समय खाने और प्रत्येक निवाले को खूब अच्छे से चबाने से।
भूख का समय कैसे स्थायी करें?
भोजन समय का नियम बांध लेने और फिर बीच में कुछ भी न खाने से।
सौ प्रकार का भोजन शरीर में सौ प्रकार के विकार उत्पन्न करता है। अतः सादा, पौष्टिक और सात्त्विक भोजन ही करना चाहिए।
ऑस्ट्रेलिया के प्रसिद्ध डॉक्टर हर्न कहते हैं कि, ‘मनुष्य जितना खाता हैं उसका एक तिहाई हिस्सा भी नहीं पचा सकता। बाक़ी पेट में रह कर रक्त को विषैला बनाकर असंख्य विकार पैदा करता है। ऊपर से फ़ालतू के भोजन को पचाने और उसे शरीर से निकालने में अधिक प्राणशक्ति का नाश करता है।
दुनिया का कोई भी व्यक्ति कम प्रकार का, कम मसाले वाला सात्विक
भोजन शांत मन से चबा चबाकर जितना पचा सके उतना ही खाकर
बड़ी सरलता से ब्रह्मचर्य को धारण कर के 100 वर्ष जी सकता है।
क्योंकि,
समस्त इंद्रियों के संयम की शुरुआत जिल्ह्वा के संयम से होती है। जो व्यक्ति जिह्वा को संयम में कर लेता है वो अपने मन के साथ जनेन्द्रियों को भी बड़ी सरलता से वश में कर सकता है। इसलिए ऐसे लोगों के लिए ब्रह्मचर्य धारण करना सबसे सरल हो जाता है।
क्योंकि जिह्वा ही मनुष्य के समस्त रसों को उत्पन्न करती है।
इसीलिए उसे संस्कृत में रसना भी कहा गया है।
सात्विक भोजन से शांत रस (Satisfaction) उत्पन्न होता है,
राजसीक भोजन से शृंगार रस (Passion) उत्पन्न होता है और
तामसी भोजन से बीभत्स व रौद्रादि रस (Lust Anger) उत्पन्न होते है।
मनुष्य जैसा भोजन करता है उसका स्वभाव ऐसा ही बनने लगता है।
इसीलिए छान्दोग्य उपनिषद् 7.26.2 कहता है कि,
आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः ।
स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः ।
“आहार की शुद्धि से ही सात्विक गुणों का संस्कार बनता है, और उसीसे फिर भगवान् की अखण्ड स्मृति होती है।”
आहार-शुद्धि से अन्तःकरण की शुद्धि होती है, अन्तःकरण की शुद्धि से निश्चल-स्मृति होती है तथा निश्चल-स्मृति से समस्त भोगों की निवृत्ति होती है।
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ – श्रीमद्भगवद्गीता, 6.7
“योग्य आहार विहार करनेवाले का, कर्मों में योग्य चेष्टा करनेवाले तथा योग्य समय पर सोने और जागनेवाले को ही दुःखमुक्ति का योग होता है।”
इसीलिए जिन्हें काम क्रोध मोह आदि विकारों से मुक्त होकर अखंड ब्रह्मचर्य का पालन करना है उनके लिए नित्य सात्विक अल्पाहार प्रथम अपरक्राम्य (Non-Negotiable) आवश्यकता है।